जानिए हिन्दू धर्म के अनुसार गंगा में विसर्जित अस्थियां आखिर जाती कहां हैं..?

शास्त्रों के अनुसार गंगा स्वर्ग से धरती पर आई है इसलिए पतितपावनी गंगा को देव नदी कहा जाता है क्योंकि मान्यता है कि गंगा श्री हरि विष्णु के चरणों से निकली है और भगवान शिव की जटाओं में आकर बसी है। आज गंगा भले ही प्रदूषित हो चूकी है परन्तु लोगों का विश्वास गंगा के प्रति अब भी कामय है।

मां गंगा के प्रति श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि अमूमन हर हिन्दू के घर गंगा जल मिलता है। मृत्युशैया पर पड़े हर इंसान को दो बूंद गंगा जल पिलाना गंगा के प्रति लोगों की आस्था और हिन्दू परंपरा को दर्शाता है। इतना ही नहीं, मृत्यु के बाद अस्थिकलश को गंगा में विसर्जित करना धार्मिक मान्यता है। आइए आज अस्थिकलश को गंगा में प्रवाहित करने के पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक कारण को जानते हैं।

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पौराणिक और धार्मिक महत्व:-

शास्त्रों के अनुसार गंगाजी को देव नदी कहा गया है। गंगा स्वर्ग से धरती पर आई थी इसलिए गंगाजी को देव नदी कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि गंगा श्री हरि विष्णु के चरणों से निकली है और भगवान शिव की जटाओं में आकर बसी हैं। श्री हरि और भगवान शिव से घनिष्ठ संबंध होने के कारण गंगा को पतित पाविनी कहा जाता है।

मान्यता है कि गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सभी पापों का नाश हो जाता है। यह सोचकर एक दिन देवी गंगा श्री हरि से मिलने बैकुण्ठ धाम गई और बोली, हे देव! मेरे जल में स्नान करने से सभी के पाप नष्ट हो जाते हैं। हे देव मैं कैसे इतने पापों का बोझ उठाऊंगी? यह सुनकर श्री हरि बोले हे देवी गंगा! जब साधु, संत, वैष्णव आकर आप में स्नान करेंगे तो ये सभी पाप धुल जाएंगे, और आप सदैव परित्र रहेंगी।

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क्या आपने सोचा है? प्रत्येक हिंदू की अंतिम इच्छा होती है कि उसकी अस्थियों का विसर्जन गंगा में ही किया जाए लेकिन यह अस्थियां जाती कहां हैं? बेशक यह शोध का विषय है पर इसका उत्तर वैज्ञानिक भी नहीं दे पाए क्योंकि गंगा सागर तक खोज करने के बाद भी इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिला। असंख्य मात्रा में अस्थियों का विसर्जन करने के बाद भी गंगा जल पवित्र एवं पावन है। मान्यता के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए मृत व्यक्ति की अस्थियां को गंगा में विसर्जन किया जाता है। ऐसा करने से व्यक्ति के प्राण श्री हरि के चरणों में बैकुण्ठ जाती हैं।

वैज्ञानिक महत्व:-

वैज्ञानिक दृष्टि से गंगा जल में पारा अर्थात (मर्करी) विद्यमान होता है जिससे हड्डियों में कैल्सियम और फास्फोरस पानी में घुल जाता है। जो जलजन्तुओं के लिए एक पौष्टिक आहार है। क्यूंकि हड्डियों में गंधक (सल्फर) विद्यमान होता है जो पारे के साथ मिलकर पारद का निर्माण होता है, इसके साथ-साथ यह दोनों मिलकर मर्करी सल्फाइड साल्ट का निर्माण करते हैं। हड्डियों में बचा शेष कैल्शियम, पानी को स्वच्छ रखने का काम करता है। धार्मिक दृष्टि से पारद शिव का प्रतीक है और गंधक शक्ति का प्रतीक है। सभी जीव अंततः शिव और शक्ति में ही विलीन हो जाते हैं।

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हर हर गंगे – ऊँ नम: शिवाय!! 

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