क्या आपने कभी तैरने वाला डाकघर देखा है?

डाकघर एक सुविधा है जो पत्रों को जमा करने (पोस्ट करने), छांटने, पहुंचाने आदि का कार्य करती है। यह एक डाक व्यवस्था के तहत काम करता है। लगभग 500 साल पुरानी ‘भारतीय डाक प्रणाली’ आज दुनिया की सबसे विश्वसनीय और बेहतर डाक प्रणाली में अव्वल स्थान पर है। आज भी हमारे यहाँ हर साल क़रीब 900 करोड़ चिठियों को भारतीय डाक द्वारा दरवाज़े – दरवाज़े तक पहुंचाया जाता है।

भारतीय डाक-व्यवस्था

अंग्रेज़ों ने सैन्य और खुफ़िया सेवाओं की मदद के मक़सद लिए भारत में पहली बार 1688 में मुंबई में पहला डाकघर खोला। फिर उन्होंने अपने सुविधा के लिए देश के अन्य इलाकों में डाकघरों की स्थापना करवाई। 1766 में लॉर्ड क्लाकइव द्वारा डाक-व्यसवस्थाा के विकास के लिए कई कदम उठाते हुए, भारत में एक आधुनिक डाक-व्यवस्था की नींव रखी गई। इस सम्बंध में आगे का काम वारेन हेस्टिंईग्सस द्वारा किया गया, उन्होंने 1774 में कलकत्ता में पहले जनरल पोस्टस ऑफिस की स्थाापना की। यह जी.पी.ओ. (जनरल पोस्टु ऑफिस) एक पोस्ट मास्ट्र जनरल के अधीन कार्य करता था। फिर आगे 1786 में मद्रास और 1793 में बंबई प्रेसीडेंसी में ‘जनरल पोस्ट् ऑफिस’ की स्थापना की गई।

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कहां है तैरने वाला डाकघर ????

भारत के जम्मू-कश्मीर में है तैरने वाला डाकघर

जम्मू-कश्मीर में जहां षाम होते ही सड़क पर सन्नाटा छा जाता है , एक सरकारी कार्यालय रात में भी खुला रहता है। श्रीनगर में डल झील के किनारे बना डाकघर रात को भी खुला रहता है। सवाल उठता है कि इतनी रात यहां कोई क्यों आएगा? जवाब भी हाजिर है। लोग अपनी चिट्ठयां डालने , स्पीड पोस्ट , पार्सल देने , डाक टिकट खरीदने आते है।

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श्रीनगर के इस 24 घंटे खुले रहने वाले डाकघर की काया पलटने वाले यहां के पोस्टमास्टर जनरल जॉन सैमूएल हैं। करीब दो साल पहले तक यह डाकघर बुरी हालत में था। इमारत पुरानी थी ही , रंग-रोगन फीका पड़ चुका था , जाले लगे थे। सैम्युअल ने आते ही इसकी सफाई की जिम्मेदारी ली। सैम्युअल के प्रयत्नों से आज प्रदेष के 1700 डाक खाने काम कर रहे है। इस डाकघर को सर्वश्रेष्ठ प्रदर्षन में दूसरा स्थान मिला।

Postoffice

जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर के डल झील में ‘फ्लोटिंग पोस्ट-ऑफिस’ सैलानियों के आकर्षण की वजह बन गया है. यहाँ से जो चिट्ठियाँ आप अपने प्रियजनों को भेजते हैं, उन लिफाफों पर कश्मीर की खूबसूरत तस्वीर होती है. 2011 से पहले इस डाकघर को ‘नेहरु पार्क पोस्ट-ऑफिस’ कहा जाता था लेकिन पोस्ट मास्टर जॉन सैमूएल ने इसका नाम बदल कर ‘फ्लोटिंग पोस्ट-ऑफिस’ कर दिया

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