क्या सम्बन्ध है! भगवान गणेश का शुभ-लाभ एवं लक्ष्मी-सरस्वती से!!

आखिर क्यों होती है भगवान गणेशा की पूजा सबसे पहले

 हिन्दू धर्म में पौराणिक कथाओं के अनुसार गणेश भगवान को सब देवी देवताओं में सर्वप्रथम पूजा जाता है| क्युकी ये सम्मान उन्हें उनके माता -पिता देवी पार्वती एवं भगवान शिव से प्राप्त हुआ है| जब एक बार गणेश भगवान की परीक्षा लेने के लिए उनके गुरु ने उन्हें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करने को कहा तब भगवान गणेशा ने अपने माता पिता (पार्वती-शिव) की परिक्रमा करने के बाद अपने गुरुवर से कहा क्युकी उनके अनुसार कोई भी माता- पिता से बढ़कर नहीं है। और मेरे लिए यही सम्पूर्ण परिक्रमा के सामान है| यह सुनकर उनके गुरु बहुत प्रसन्न हुए. उनका नामकरण शिव भगवान ने किया है गणेश का अर्थ होता है गणों में उत्तम अथार्त सेवकों में सबसे प्रमुख।

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आखिर कौन हैं ऋद्धि-सिद्धि एवं उनके जनक:-

 प्राचीन काल में ऋद्धि-सिद्धि का विवाह भगवान गणेश के साथ हुआ था जो की ब्रह्मा की पुत्रियां थी| क्यूंकि ब्रम्हा ऋद्धि- सिद्धि के जनक है उन्होंने उनकी उत्पत्ति मानसिक रूप से की थी उस नाते उनमे पिता- पुत्री का सम्बन्ध बना।  अधिकाँश हिन्दू पुराणों में गणेश प्रभु को ऋद्धि- सिद्धि का स्वामी कहा गया है, वहाँ स्वामी का तातपर्य पति से है| जिस प्रकार पत्नी पति की अर्धांगनी होती है वो एक दूसरे के पूरक होते हैं उसी प्रकार गणेश जी भी अष्ट सिद्धि के स्वामी कहे जाते है ।

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भगवान गणेशा का शुभ लाभ से सम्बन्ध:-

 हिन्दू धर्म में अधिकाँश लोग शुभ कार्य करने से पहले या त्योहारों पर जैसे दीपावली आदि पर शुभ- लाभ लिखते है पर इसका वास्तविक अर्थ नहीं जानते  वास्तव में शुभ – लाभ भगवान गणेश के पुत्र है। शुभ का अर्थ पवित्र है एवं लाभ का अर्थ फायदे से है। शुभ की जन्मदात्री ऋद्धि हैं एवं लाभ की जन्मदात्री सिद्धि हैं। गणेश पुराण के अनुसार शुभ – लाभ को केशं एवं लाभ नामों से भी जाना जाता है।  

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भगवान गणेशा का लक्ष्मी एवं सरस्वती से सम्बन्ध:-

 लक्ष्मी देवी धन धान्य की एवं सरस्वती ज्ञान-संगीत की देवी है। लक्ष्मी को श्री के नाम से भी जाना जाता है विष्णु भगवान की अर्धांगनी  एवं पुराण के अनुसार ऋषि भृगु एवं उनकी पत्नी ख्याति की पुत्री हैं। जब विष्णु भगवान भिन्न-भिन्न रूप में अवतरित हुए जैसे वामन, परशुराम, राम, कृष्णा  तब वह क्रमशः पदमा, धरणी,सीता, रुक्मिणी रूप में उनके साथ अवतरित हुई।

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 सरस्वती का अर्थ है सरस- द्रव ,वती- सरलता अथार्त ऊर्जा का अविरलता से बहना।  इन्हे शारदा नाम से भी जाना जाता है ये देवी गायत्री का ही दूसरा रूप हैं एवं ब्रह्मा की अर्धांगनी है।संपूर्ण भारत में लक्ष्मी, सरस्वतीएवं गणेश की पूजा साथ में होती है एवं एक  साथ ही चित्रित किये जाते है।  इसका कारण ये है की लक्ष्मी एवं सरस्वती गणेश प्रभु की मुँह बोली बहनें हैं ये दोनों क्रमशः दाए एवं वाये ओर बैठी होती हैं। गणेश लक्ष्मी के साथ मिलकर भौतिवाद की वस्तुओं पर अधिकार रखते है एवं सरवती के साथ बुद्धि व आध्यत्मिक वस्तुओं से सम्बन्ध रखते हैं।

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