Sri Krishna Janmashtami 2019- कृष्ण जन्माष्टमी पर कैसे प्रसन्न करें भगवान श्री कृष्ण को! जानिए शुभ मुहूर्त, पूजा विधि?

ऐसे करें भगवान श्री कृष्ण को प्रसन्न…

हिंदू धर्म के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के अवतार हैं। वहीं सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु सर्वपापहारी पवित्र और समस्त मनुष्यों को भोग व मोक्ष प्रदान करने वाले प्रमुख देवता हैं। वैसे तो भगवान विष्णु ने अभी तक 23 अवतारों को धारण किया, लेकिन इन अवतारों में उनके सबसे महत्वपूर्ण अवतार श्रीकृष्ण व श्रीराम माने गए हैं।

1. विष्‍णु पुराण के अनुसार जो व्यक्ति भगवान विष्‍णु को प्रसन्न रखना चाहते हैं और उनकी कृपा पाना चाहते हैं उन्हें अपने काम से मतलब रखना चाहिए। साथ ही उन्हें इस बात का भी ध्यान रहना चाहिए की दूसरों की निंदा करने से बचना है।

2. प्रभु को प्रसन्न करने के लिए इस बात को ख्याल रहे कि जितना अपने पास धन-संपत्ति हो उसी में संतुष्ट रहें, दूसरों के धन के प्रति लालच न करें।

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3. पराई स्‍त्री के प्रति गलत नजर व काम भाव से बचना चाहिए। साथ ही गुरुजनों, देवता आदि के प्रति बुरे शब्द नहीं कहने पर ही भगवान कृष्ण उनसे प्रसन्न रहते हैं।

4. जो व्यक्ति झूठ बोलकर दूसरों को बदनाम करने की कोशिश करता है, उसे अगले जन्म में इसका दंड भोगना पड़ता है। इसलिए दूसरों पर झूठे इल्जाम लगाकर उन्हें बदनाम न करें।

5. जीवों के प्रति दया भाव रखें, किसी जीव की हत्या या उन्हें चोट पहुंचाने की कोशिश न करें। इसके अलावा किसी के प्रति अपना-पराया या फिर शत्रु आदि का भाव न रखकर सबके साथ समभाव रखना चाहिए।

पुराणों के अनुसार अष्टमी दो प्रकार की है- पहली जन्माष्टमी और दूसरी जयंती। इसमें केवल पहली अष्टमी है।

स्कन्द पुराण के मतानुसार जो भी व्यक्ति जानकर भी कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को नहीं करता, वह मनुष्य जंगल में सर्प और व्याघ्र होता है।

ब्रह्मपुराण का कथन है- कि कलियुग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी में अट्ठाइसवें युग में देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए थे। यदि दिन या रात में कलामात्र भी रोहिणी न हो तो विशेषकर चंद्रमा से मिली हुई रात्रि में इस व्रत को करें।

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भविष्य पुराण का वचन है- श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को जो मनुष्य नहीं करता, वह क्रूर राक्षस होता है। केवल अष्टमी तिथि में ही उपवास करना कहा गया है। यदि वही तिथि रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो ‘जयंती’ नाम से संबोधित की जाएगी। वह्निपुराण का वचन है कि कृष्णपक्ष की जन्माष्टमी में यदि एक कला भी रोहिणी नक्षत्र हो तो उसको जयंती नाम से ही संबोधित किया जाएगा। अतः उसमें प्रयत्न से उपवास करना चाहिए।

विष्णुरहस्यादि वचन से– कृष्णपक्ष की अष्टमी रोहिणी नक्षत्र से युक्त भाद्रपद मास में हो तो वह जयंती नामवाली ही कही जाएगी।

वसिष्ठ संहिता का मत है- यदि अष्टमी तथा रोहिणी इन दोनों का योग अहोरात्र में असम्पूर्ण भी हो तो मुहूर्त मात्र में भी अहोरात्र के योग में उपवास करना चाहिए। मदन रत्न में स्कन्द पुराण का वचन है कि जो उत्तम पुरुष है। वे निश्चित रूप से जन्माष्टमी व्रत को इस लोक में करते हैं। उनके पास सदैव स्थिर लक्ष्मी होती है। इस व्रत के करने के प्रभाव से उनके समस्त कार्य सिद्ध होते हैं। विष्णु धर्म के अनुसार आधी रात के समय रोहिणी में जब कृष्णाष्टमी हो तो उसमें कृष्ण का अर्चन और पूजन करने से तीन जन्मों के पापों का नाश होता है।

महृषि भृगु ने कहा है- जन्माष्टमी, रोहिणी और शिवरात्रि ये पूर्वविद्धा ही करनी चाहिए तथा तिथि एवं नक्षत्र के अन्त में पारणा करें। इसमें केवल रोहिणी उपवास भी सिद्ध है। अन्त्य की दोनों में परा ही लें।

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आगे पढ़ें साल बाद कैसे बन रहा है नक्षत्र का संयोग….

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