जानिए भगवान शिव ने कहां और क्यों काट दिया था गणेशजी का सिर!!

गणेशजी के जन्म की कहानी..

एक बार शिवजी के गण नंदी ने देवी पार्वती की आज्ञा पालन में त्रुटि कर दी थी। इससे नाराज देवी ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक का निर्माण कर उसमें प्राण डाल दिए और कहा कि तुम मेरे पुत्र हो। तुम मेरी ही आज्ञा का पालन करना किसी और की नहीं। देवी पार्वती ने यह भी कहा कि मैं स्नान के लिए जा रही हूं। ध्यान रखना कोई भी अंदर न आने पाए। थोड़ी देर बाद वहां भगवान शंकर आए और देवी पार्वती के भवन में जाने लगे।

यह देखकर उस बालक ने विनयपूर्वक उन्हें रोकने का प्रयास किया। बालक का हठ देखकर भगवान शंकर क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया। देवी पार्वती ने जब यह देखा तो वे बहुत क्रोधित हो गई। उनकी क्रोध की अग्नि से सृष्टि में हाहाकार मच गया। तब सभी देवताओं ने मिलकर उनकी स्तुति की और बालक को पुनर्जीवित करने के लिए कहा।

तब भगवान शंकर के कहने पर विष्णुजी एक हाथी का सिर काटकर लाए और वह सिर उन्होंने उस बालक के धड़ पर रखकर उसे जीवित कर दिया। तब भगवान शंकर व अन्य देवताओं ने उस गजमुख बालक को अनेक आशीर्वाद दिए। देवताओं ने गणेश, गणपति, विनायक, विघ्नहरता, प्रथम पूज्य आदि कई नामों से उस बालक की स्तुति की।

यह था शिवजी को श्राप..

एक समय में माली और सुमाली दो राक्षस थे जो शिव को समर्पित थे। सूर्य देव उन राक्षसों को उनके पापों के लिए मारने वाले थे। राक्षसों ने शिव से प्रार्थना की और शिव ने उनकी रक्षा के लिए हस्तक्षेप किया।

उन्होंने सूर्य को अपने त्रिशूल से मार दिया और इससे सारी दुनिया अंधेरे में डूब गयी। त्रिशूल की चोट से सूर्य की चेतना नष्ट हो गई और वह तुरंत रथ से नीचे गिर पड़े। जब कश्यपजी ने देखा कि उनका पुत्र मरणासन्न अवस्था में हैं, तो वे उसे छाती से लगाकर फूट-फूटकर विलाप करने लगे।

सारे देवताओं में हाहाकार मच गया। सभी भयभीत होकर रोने लगे। तब ब्रह्मा के पौत्र तपस्वी कश्यप जी ने शिवजी को शाप दिया, वे बोले जैसा आज तुम्हारे प्रहार के कारण मेरे पुत्र का हाल हो रहा है। ठीक वैसे ही तुम्हारे पुत्र पर भी होगा।

तुम स्वयं अपने ही पुत्र का मस्तक काट दोगे। इसी श्राप के कारण ऐसे संयोग बने कि महादेव को गणेश जी का सर काटना पड़ा।

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