रहस्य:- जानिए कैसे हुई इस ब्रह्मांड की उत्पत्ति और कौन हैं सृष्टि (ब्रह्माण्ड) के रचयिता?

भगवान शिव का आदेश प्राप्त कर विष्णु कठोर तपस्या करने लगे। उस तपस्या के श्रम से उनके अंगो  से जल धाराएं निकलने लगी, जिससे सुना आकाश भर गया। अंततः उन्होंने थककर उसी जल में शयन किया। जल अर्थात ‘नीर’ में शयन करने के कारण ही श्रीविष्णु का एक नाम ‘नारायण’ हुआ।

तदन्तर सोये हुए नारायण की नाभि से एक उत्तम कमल प्रकट हुआ। उसी समय भगवान शिव ने आपने दाहिने अण्ड से चतुर्मुखः ब्रम्हा को प्रकट करके उस कमल पर बैठा दिया। महेश्वर की माया से मोहित हो जाने के कारण बहुत दिनों तक ब्रम्हा जी उस कमल की नाल में भ्रमण करते रहे।

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किन्तु उन्हें अपने उत्पक्तिकर्ता का पता नहीं लगा। आकाशवाणी द्वारा तप का आदेश मिलने पर आपने जन्मदाता के दर्शनाथ बारहा वर्षों तक कठोर तपस्या की। तत्पश्चात उनके समुख विष्णु प्रकट हुए। श्री परमेश्वर शिव की लीला से उस समय वँहा श्री विष्णु और ब्रम्हा जी के बीच विवाद हो गया।

कुछ देर बाद उन दोनों के मध्य एक अग्निस्तम्भ प्रकट हुआ। बहुत प्रयास के बाद भी विष्णु एंड ब्रम्हा जी उस अग्निस्तम्भ के आदि – अंत का पता नहीं लगा सके। अंततः थककर भगवान विष्णु ने प्रार्थना की हे महाप्रभो!’ हम आपके स्वरुप को नहीं जानते। आप जो कोई भी हैं’ हमे दर्शन दीजिये।

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भगवान विष्णु की स्तुति सुनकर महेश्वर सहसा प्रकट हो गए और बोले – सुरश्रेष्ठगण! में तुम दोनों के तप और भक्ति से भलीभांति संतुस्ट हूँ। ब्रम्हा! तुम मेरी आज्ञा से जगत की सृष्टि करो और वत्स विष्णु! तुम  इस चराचर जगत का पालन करो। तदन्तर भगवान शिव ने अपने हृदयभाग  से रूद्र को प्रकट किया और संहार का दायित्व सौंपकर वंही अंतर्ध्यान हो गये।

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