अद्भुत रहस्य:- जानिये आखिर कैसे पायें मृत्यु पर विजय!!!

“भगवान शंकर ने कहा”

महामुनि मृगश्रृंग की प्रार्थना सुनने के बाद भगवान शिव शंकर “तथास्तु” कहकर अंतर्ध्यान हो गए। उसके बाद महामुनि मृगश्रृंग ने अपने बेटे से कहा मैंने जो भगवान शिव से प्रार्थना की थी स्वीकार हुई और तुम्हारे अंदर भोलेनाथ के अद्भुत गुण विधमान हैं तुमसे हम दम्पति अतयंत सुखी और गौरवान्वित है’ महामुनि मृगश्रृंग ने कुछ रूककर बहुत हलके स्वर में बेटे से कहा- ‘अब तुम्हारा सोहलवा वर्ष समाप्त हो चला है’ और तुम्हारा समय अत्यंत समीप है। 

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इतना सुनने के बाद श्री मार्कण्डेय जी नें अत्तयंत गंभीरता से अपने पिता जी को आश्वत करने के लिए बहुत ही सरल शब्दों में कहा। -“आप मेरे लिए चिंता न करें”। भगवान शिव महेश्वर कल्याणस्वरूप एवं अभीष्ट फलदाता हैं। में उनके मंगलमय चरणों का आश्रय लेकर, उनकी तपस्या एवं उपासना करके अमरत्व प्राप्त करने का प्रयत्न करूँगा।

तभी श्री मार्कण्डेय जी अपने माता- पिता के चरणों की धूल मस्तक पर लगाकर भगवान महादेव शंकर का स्मरण करते हुए दक्छिन समुद्र के तट पर पहुंचे। उन्होंने अपने ही नाम पर शिवलिंग की स्थापना की और त्रिकाल- स्नान करके बड़ी ही श्रद्धा से भगवान मृतुन्जय की उपासना करने लगे। भगवान शंकर तो महादेव ठहरे। एक ही दिन में प्रसन्न होकर उन्होनें श्री मार्कण्डेय जी को निहाल कर दिया।

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मार्कण्डेय जी की मृत्यु के दिन क्या हुआ आगे पढ़ें…………

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