जानिए हिन्दू धर्म में जनेऊ धारण करने का धार्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व!!

क्या आपको जनेऊ का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व पता है? अगर नहीं तोह पढ़िए…

हम भारतीय हिन्दू धर्म की ऐसी कई परंपराओं से बंधे हुए हैं, जिनका पालन करना हमें हमारा धर्म सिखाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन परंपराओं का सिर्फ़ धार्मिक लिहाज से ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक लिहाज से भी बेहद महत्व है। हमारे समाज में जितनी भी धार्मिक परंपराएं हैं, उनका वैज्ञानिक पक्ष धार्मिक पक्ष से अधिक बलवान है। और हमारे सनातन धर्म में जो भी परंपराएं हैं उन सब का कहीं न कहीं वैज्ञानिक कारण जरूर है।

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जनेऊ का धार्मिक महत्व:-

भारतीय संस्कृति में यज्ञोपवीत यानी जनेऊ धारण करने की परंपरा वैदिक काल से ही चली आ रही है. ‘उपनयन’ की गिनती सोलह संस्कारों में होती है. पर आज के दौर में लोग जनेऊ पहनने से बचना चाहते हैं. नई पीढ़ी के मन में सवाल उठता है कि आख‍िर इसे पहनने से फायदा क्या होगा?  जनेऊ केवल धार्मिक नजरिए से ही नहीं, बल्कि सेहत के लिहाज से भी बेहद फायदेमंद है। जनेऊ पहनने के फायदों की यहां संक्षेप में चर्चा की गई है।

जनेऊ धारण करना इन्हीं परंपराओं में से एक है। वैसे जनेऊ को लेकर लोगों में कई भ्रांतियां मौजूद हैं। लोग जनेऊ को सिर्फ़ धर्म के चश्मे से देखते हैं, बल्कि हकीक़त ये है कि इसका वैज्ञानिक पक्ष ही सबकुछ है। जनेऊ को ‘यज्ञोपवीत संस्कार’ के नाम से भी जाना जाता है।

जनेऊ को उपवीत, यज्ञसूत्र, व्रतबन्ध, बलबन्ध, मोनीबन्ध और ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं। जनेऊ धारण करने की परम्परा बहुत ही प्राचीन है। वेदों में जनेऊ धारण करने की हिदायत दी गई है। 

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शास्त्रों में दाएं कान में माहात्म्य का वर्णन भी किया गया है। आदित्य, वसु, रूद्र, वायु, अगि्न, धर्म, वेद, आप, सोम एवं सूर्य आदि देवताओं का निवास दाएं कान में होने के कारण उसे दाएं हाथ से सिर्फ स्पर्श करने पर भी आचमन का फल प्राप्त होता है। यदि ऎसे पवित्र दाएं कान पर यज्ञोपवीत रखा जाए तो अशुचित्व नहीं रहता।

जनेऊ को  ‘उपनयन संस्कार’ (यज्ञोपवीत संस्कार) के समय धारण किया जाता है। संस्कृत भाषा में जनेऊ को ‘यज्ञोपवीत’ कहा जाता है। यह सूत से बना पवित्र धागा होता है, जिसे बाएं कंधे के ऊपर से दाईं भुजा के नीचे तक पहना जाता है। यह केवल धर्माज्ञा ही नहीं, बल्कि आरोग्य का पोषक भी है। ऐसा माना जाता है कि सबसे पहले बालक द्विज का यज्ञोपवीत संस्कार हुआ था, जिसके बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त हुआ था। साधारण भाषा में जनेऊ एक ऐसी परंपरा है, जिसके बाद ही एक बच्चे को मर्द का स्थान दिया जाता है और वह पारंपरिक तौर से पूजा आदि में भाग ले सकता है।

यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करने का मन्त्र है. . . . . .

यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।

ब्रह्मचारी को 3 धागों बाला और विवाहित को 6 धागो बाला जनेऊ धारण करना चाहिये।

जनेऊ धारण संस्कार क्या है

जनेऊ का रहस्य:-

दरअसल इसके पीछे साइंस का गहरा रह्स्य छिपा है। दाँत पर दाँत बैठा कर रहने से आदमी को लकवा नहीं मारता। आदमी को दो जनेऊ धारण कराया जाता है, एक पुरुष को बताता है कि उसे दो लोगों का भार या ज़िम्मेदारी वहन करना है, एक पत्नी पक्ष का और दूसरा अपने पक्ष का अर्थात् पति पक्ष का, अब एक एक जनेऊ में 9 – 9 धागे होते हैं। जो हमें बताते हैं कि हम पर पत्नी और पत्नी पक्ष के 9 – 9 ग्रहों का भार ये ऋण है उसे वहन करना है। अब इन 9 – 9 धांगों के अंदर से 1 – 1 धागे निकालकर देंखें तो इसमें 27 – 27 धागे होते हैं।

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अर्थात् हमें पत्नी और पति पक्ष के 27 – 27 नक्षत्रों का भी भार या ऋण वहन करना है। अब अगर अंक विद्या के आधार पर देंखे तो 27+9 = 36 होता है, जिसको एकल अंक बनाने पर 36 = 3+6 = 9 आता है, जो एक पूर्ण अंक है। अब अगर इस 9 में दो जनेऊ की संख्या अर्थात 2 और जोड़ दें तो 9 + 2 = 11 होगा जो हमें बताता है की हमारा जीवन अकेले अकेले दो लोगों अर्थात् पति और पत्नी ( 1 और 1 ) के मिलने सेबना है। 1 + 1 = 2 होता है जो अंक विद्या के अनुसार चंद्रमा का अंक है और चंद्रमा हमें शीतलता प्रदान करता है।जब हम अपने दोनो पक्षों का ऋण वहन कर लेते हैं तो हमें अशीम शांति की प्राप्ति हो जाती है। तो यह है जनेऊ का वास्तविक रहस्य।

जनेऊ का वैज्ञानिक एवं शारीरिक महत्व:-

बहरहाल, धार्मिक बातों के अलावा जनेऊ का वैज्ञानिक पक्ष भी है। वैज्ञानिक रूप से जनेऊ धारण करने के कई लाभ हैं। धार्मिक रूप से नित्यक्रम से पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर दो बार लपेटना अनिवार्य है।

1. जीवाणुओं और कीटाणुओं से बचाव

आदमी का इम्यून सिस्टम कमजोर होने से कीटाणुओं और जीवाणुओं के शरीर पर हमले शुरू हो जाते हैं। पर जो लोग जनेऊ पहनते हैं और इससे जुड़े नियमों का पालन करते हैं, वे मल-मूत्र त्याग करते वक्त अपना मुंह बंद रखते हैं। इसकी आदत पड़ जाने के बाद लोग बड़ी आसानी से गंदे स्थानों पर पाए जाने वाले जीवाणुओं और कीटाणुओं के प्रकोप से बच जाते हैं।

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2. तन निर्मल, मन निर्मल

जनेऊ को कान के ऊपर कसकर लपेटने का नियम है। ऐसा करने से कान के पास से गुजरने वाली उन नसों पर भी दबाव पड़ता है, जिनका संबंध सीधे पेट की आंतों से है। इन नसों पर दबाव पड़ने से कब्ज की श‍िकायत नहीं होती है। पेट साफ होने पर शरीर और मन, दोनों ही सेहतमंद रहते हैं।

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3. बल व तेज में बढ़ोतरी

दाएं कान के पास से वे नसें भी गुजरती हैं, जिसका संबंध अंडकोष और गुप्तेंद्रियों से होता है। मूत्र त्याग के वक्त दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से वे नसें दब जाती हैं, जिनसे वीर्य निकलता है। ऐसे में जाने-अनजाने शुक्राणुओं की रक्षा होती है. इससे इंसान के बल और तेज में वृद्ध‍ि होती है।

4. हृदय रोग व ब्लडप्रेशर से बचाव

रिसर्च में मेडिकल साइंस ने भी पाया है कि जनेऊ पहनने वालों को हृदय रोग और ब्लडप्रेशर की आशंका अन्य लोगों के मुकाबले कम होती है। जनेऊ शरीर में खून के प्रवाह को भी कंट्रोल करने में मददगार होता है।

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5. स्मरण शक्ति‍ में इजाफा

कान पर हर रोज जनेऊ रखने और कसने से स्मरण शक्त‍ि में भी इजाफा होता है. कान पर दबाव पड़ने से दिमाग की वे नसें एक्ट‍िव हो जाती हैं, जिनका संबंध स्मरण शक्त‍ि से होता है। दरअसल, गलतियां करने पर बच्चों के कान ऐंठने के पीछे भी मूल मकसद यही होता था।

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6. मानसिक बल में बढ़ोतरी

यज्ञोपवीत की वजह से मानसिक बल भी मिलता है। यह लोगों को हमेशा बुरे कामों से बचने की याद दिलाता रहता है. साथ ही ऐसी मान्यता है कि जनेऊ पहनने वालों के पास बुरी आत्माएं नहीं फटकती हैं। इसमें सच्चाई चाहे जो भी हो, पर केवल मन में इसका गहरा विश्वास होने भर से फायदा तो होता ही है।

7. आध्यात्म‍िक ऊर्जा की प्राप्त‍ि

जनेऊ धारण करने से आध्यात्म‍िक ऊर्जा भी मिलती है। ऐसी मान्यता है कि यज्ञोपवीत में प्रभु का वास होता है. यह हमें कर्तव्य की भी याद दिलाता है।

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Source: Aajtak & Pratibimbprakash

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