जानिये आखिर क्यों आया था भगवान पुरषोत्तम श्री राम को क्रोध!!

आखिर कैसे और क्यों आया था भगवान श्रीराम को क्रोध पढ़िए इस लेख में…

रामायण के अनुसार कैकेई के वचनों को पूरा करने के  लिए श्री राम भगवान ने १४ वर्षों का वनवास लिया और वन की ओर निकल दिए उनके साथ सीता एवं लक्ष्मण भी गए वन में तीनो जीवन- यापन करने लगे वनवास के १३ वर्ष समाप्त हो गए थे एक वर्ष शेष रह गया था इसी अंतिम वर्ष की बात है कि एक दिन सुर्पनखना श्रीराम को देख कर उन पर मोहित हो गयी और उनके आगे विवाह का प्रस्ताव रख दिया।

तब श्रीराम ने बड़ी विनम्रता से सुरपखना को समझया की वो विवाहित हैं और अपनी स्त्री से स्नेह करते हैं एवं दूसरा विवाह करने के इच्छुक नहीं हैं लाख समझाने पर भी नहीं मानी इस पर लक्ष्मण जी को क्रोध आ गया और क्रोध क वशीभूत सुर्पनखना के नाक,कान काट दिए इस बात का बदला लेने के लिए सुर्पनखना ने इसकी शिकायत अपने बड़े भाई रावण से कर दी।

url.jpgf_-300x187रावण के लिए ये घोर अपमान की बात थी कि कोई इस तरह उसकी बहन की बेइजत्ती कर दे इस अपमान का बदला लेने के लिए एक दिन अवसर पाकर रावण ऋषि  का वेश धर कर भीष मांगने सीता की चौखट पर आ गया सीता ने दहलीज़ पार करने से मन कर दिया और कहा आप यही से भिक्षा ग्रहण करिये ऋषिवर ये लक्ष्मणरेखा है मैं इसे पार नहीं कर सकती लेकिन काफी वाद-विवाद के बाद सीता लक्ष्मणरेखा पार करके भिक्षा देने को तैयार हो गईं और रावण सीता जी को हर क ले गया।

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पुरषोत्तम श्री राम के क्रोध का कारण:-

घोर विपदा का समय था रावण सीता को हर के लंका ले गया था और लंका तक पहुँचना इतना आसान न था चुकी समस्या ये थी की समुन्द्र पार कैसे किया जाये ? तब पुषोत्तम राम ने समुन्द्र देवता से विनती की कि आप कुछ समय के लिए शांत हो जाए लेकिन वो अभिमान से चूर हठ कर बैठे और शांत होने की जगह और विकराल रूप से झूमने लगे। ये देखकर श्रीराम को क्रोध आ गया तो उन्होंने समुन्द्र देवता को चेतावनी देते हुए कुछ वचन कहे उन्होंने समुन्द्र देवता को समझाया कि ” जिस प्रकार फलदार वृक्ष फल देना नहीं छोड़ता, सूर्य निकलना नहीं छोड़ता एवं चंदन हजारों सर्प लिपटे होने होने पर भी शीतलता नहीं छोड़ता उसी प्रकार तुम अपनी मर्यादा नहीं लांघ सकते।

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यदि तुमने ऐसा किया तो तुम्हारा यश अपयश में बदल जायेगा की समुन्द्र अपनी सीमा कभी नहीं लांघता ये गलत साबित हो जायेगा अब विचार करने की तुम्हारी बारी है अन्यथा मैं तुम्हारे जल को शब्द भेदी बाड से सुख दूंगा और उसमें रहने वाले सभी जीव की मौत का कारण सिर्फ तुम होंगे ये सुनकर समुन्द्र देवता की समझ आ गया और तब श्रीराम भगवान से माफी मांगते हुए कि हे प्रभु मुझसे गलती हो गयी मुझे माफ करें कहकर शांत हो गए और फिर नल-नील ने रामसेतु का निर्माड़ करके लंका तक का मार्ग तैयार किया एवं रावण पर विजय प्राप्त करके सीता जी को सकुशल अयोध्या ले आये।

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