सवालों के कठघरे में खड़े हुए “दि हिन्दू” अंग्रेजी अख़बार और कुछ कांग्रेसी चाटुकार पत्रकार!!

सर्जिकल हमले के दावों के बीच जानिए तब में और अब में क्या है अंतर… 

देश में भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान में जाकर किये गए सर्जिकल हमले के बाद से ही लोग सेना और पीएम मोदी की खूब सराहना कर रहे हैं और बीजेपी भी इस अवसर को भुनाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ रही ऐसे में कांग्रेस सरकार भी अपनी पीठ थपथपाने से पीछे नहीं रहना चाहती और सर्जिकल हमले के बाद से कांग्रेस सरकार के दौरान भी सर्जिकल हमलों की खबरे सामने आ रही हैं और कांग्रेस सरकार का कहना है कि उन्होंने देशहित से जुड़े इस मुद्दे को सार्वजनिक करके इसका राजनीतिक फायदा लेने की कोशिश नहीं कि इसी बीच राहुल गाँधी ने तो मोदी को सैनिकों के खून का दलाल तक कह डाला

कांग्रेस सरकार के समय में हुई सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर अंग्रेजी अखबार द हिन्दू ने बड़ा खुलासा किया है, अखबार के अनुसार जुले 2011 में भारतीय सेना ने सीमापार सर्जिकल हमला कर पाकिस्तानी सैनिकों को सबक सिखया था। 

“ऑपरेशन जिंजर” पाकिस्तानी सेना की उस कार्रवाई के जवाब में किया गया था जिसमें 6 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे. जैसे को तैसा जैसी कार्रवाई करते हुए भारतीय सेना पीओके में घुस गई थी और 8 पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया गया था, इसमें से तीन के सिर कलम कर दिये गए थे, द हिन्दू अखबार ने 2011 में हुई इस सर्जिकल स्ट्राइक के पुख्ता सबूत होने का दावा किया है।

आपको बता दें कि यह बात बिलकुल सही है कि दुश्मन द्वारा अनुचित बलप्रयोग के बाद उसे सजा देने के इरादे से भारतीय सेना पहले भी सीमा पारऑपरेशन को अंजाम देती रही है पर तैयारी स्केल कम होने और राजनीतिक मंजूरी के बगैर किये गए इन ऑपरेशन को सर्जिकल स्ट्राइक नहीं कहा जा सकता, यह सेना का खुद का फैसला होता था और कुछ भी गड़बड़ होने पर सरकार इसकी कोई भी ज़िम्मेदारी नहीं लेती थी।

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अपने साथियों की मौत से नाराज़ जवान अपने रिस्क पर बिना राजनीतिक मजूरी के ऑफ़ द रिकॉर्ड जाकर इस तरह के ऑपरेशन को अंजाम देते थे और कुछ भी गड़बड़ होने पर सरकार उनपर कार्यवाही करती थी और ऑपरेशन को अजाम देने के लिए अपनी जान पर खेलने वाले अधिकारियों को अपनी रैंक तक छिनने का डर रहता था।

लेकिन उरी हमले के बाद POK में हुई सर्जिकल स्ट्राइक में तस्वीएर इससे बिलकुल भिन्न थी, इस हमले के लिए सीधे पीएम ने मंजूरी दी थी, और वह स्वयं इसकी निगरानी कर रहे थे, ऑपरेशन को पूरी तरह से राजनीतिक समर्थन प्राप्त था, और सरकार किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार थी, किसी भी इमरजेंसी के लिए भारतीय वायुसेना को तैयार रहने के आदेश थे।

यहाँ तक कि सरकार ने सीधे युद्ध से निपटने के लिए भी तैयारी कर रखी थी, सरकार के समर्थन के चलते सेना ने बड़े टारगेट सेट किये थे, और इस वजह से यह ऑपरेशन बिलकुल अलग था। किसी भी स्थिति में सरकार पूरी ज़िम्मेदारी लेने को तैयार थी। जिसके कारण सेना के जवानों का मनोबल भी बढ़ा हुआ था और उन्होंने दुश्मन को बड़ी और गहरी चोट पहुँचाने की यजना बनायीं थी। 
aum-namah-shivaya

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