जानिए नागपंचमी का महत्व!!- और क्यूं ‘नागपंचमी’ के दिन नाग को दूध नहीं पिलाना चाहिए!!

नागपंचमी:- 13 साल बाद बना है सुख, शांति और समृद्धि का यह शुभ संयोग!!

हिंदू धर्मग्रन्थों के अनुसार, श्रावण मास की शुक्ल पंचमी को नागपंचमी का पर्व मनाया जाता है। यह नागों और सर्पों की पूजा का पर्व है। मनुष्य और नागों का संबंध पौराणिक कथाओं से झलकता रहा है। हिंदू धर्मग्रन्थों में नाग को देवता माना गया है और इनका विभिन्न जगहों पर उल्लेख भी किया गया है। हिन्दू धर्म में कालिया, शेषनाग, कद्रू (साँपों की माता) पिलीवा आदि बहुत प्रसिद्ध हैं। कथाओं के अनुसार दक्ष प्रजापति की पुत्री तथा कश्यप ऋषि (जिनके नाम से कश्यप गोत्र चला) की पत्नी ‘कद्रू’ नाग माता के रूप में आदरणीय रही हैं। कद्रू को सुरसा के नाम से भी जाना जाता है।

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क्या है नागपंचमी का महत्व और पूजा की विधि:-

पौराणिक महत्ता:- शेषनाग के फन पर पृथ्वी टिकी है। भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर सोते हैं। शिवजी के गले में सर्पों का हार है। कृष्ण जन्म पर नाग की सहायता से ही वासुदेवजी ने यमुना पार की थी। यहां तक कि समुद्र-मंथन के समय देवताओं की मदद भी वासुकी नाग ने ही की थी। लिहाजा नाग देवता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है- नागपंचमी।

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वर्षा ऋतु में वर्षा का जल धीरे-धीरे धरती में समाकर सांपों के बिलों में भर जाता है। इसलिए श्रावण मास में सांप सुरक्षित स्थान की खोज में अपने बिल से बाहर निकलते हैं। संभवतः उस समय उनकी रक्षा करने और सर्पभय व सर्पविष से मुक्ति पाने के लिए भारतीय संस्कृति में इस दिन नाग के पूजन की परंपरा शुरू हुई।

आगे पढ़ें कैसे मनाते हैं नागपंचमी………..

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