जानिये हिन्दूओं के प्राचीन ग्रंथ और उपांग (षट् दर्शन)!!

हिन्दू धर्म ज्ञान का अथाह सागर है जैसे सागर कभी मोतियों से खाली नहीं हो सकता वैसे ही सनातन धर्म ज्ञान का भंडार है हिन्दू धर्म अन्य किसी धर्म की तरह किसी एक पुस्तक पर सीमित नहीं है और न ही उनका नियमित पाठ करना हिन्दूओं के लिये अनिवार्य है । हिन्दू धर्म ग्रंथों की सूची बहुत विस्तरित है। यह प्रत्येक हिन्दू की आत्मइच्छा पर निर्भर करता है कि वह किसी भी पुस्तक को चाहे पढे या ना पढे़। उनका अध्ययन करे या उनकी व्याख्या करे अथवा विश्वाश करे या अविशवास । सारांश यह कि हिन्दू धर्म में ज्ञान अर्जित करना सभी प्राणियों का निजी लक्ष्य है।
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यथार्थ विज्ञान के मौलिक ग्रंथ ज्ञान और विज्ञान का अद्भुत खजाना हैं

चार वेद – ऋगवेद, सामवेद यजुर्वेद एवं अथर्ववेद तथा वेद स्नातन धर्म के मूल ग्रंथ हैं जो परम ज्ञानी ऋषि मुनियों के अनुसंधान तथा उन की अनुभूतियों के संकलन हैं। वैदिक ज्ञान ऋषियों पर ईश्वर कृपा से उसी प्रकार प्रगट हुआ था जैसे साधारण मानव कुछ लिखने के लिये जब ऐकाग्र हो कर विचार करते हैं तो विचार अपने आप ही सजीव रूप लेने लगते हैं। यही ईश्वरीय शक्ति है।

हिन्दू मान्यतानुसार वैदिक ज्ञान ऋषि- मुनियों को लिपि रूप में प्राप्त हुआ था। महर्षि वेद व्यास ने इस ज्ञान के भंडार को को लिखित रूप में संकलित किया। वेद ज्ञान केवल अध्यात्मिक न होकर अपितु जीवन को प्रभावित करने वाले सभी विषयों को आतंनिहित किये हुए है । वेदों में भौतिक, रसायन, राजनीति, कला-संस्कृति तथा अन्य कई विषय़ों पर मौलिक ज्ञान संचित है जो ऋषियों ने निजी अविष्कारिक यत्नों तथा अनूभूतियो सें संचित किया था। यह ज्ञान सूत्रों में उपलब्ध कराया गया है। वेदों में देवताओं, प्रकृतिक शक्तियों तथा औषधियों का व्याख्यान किया गया है। संक्षेप में चार वेदों का मुख्य विषय-क्षेत्र इस प्रकार हैः –

इन चार वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद की भी अनेक शाखाएं बतायी गयी हैं। जैसे ऋग्वेद की 21, यजुर्वेद की 101, सामवेद की 1001, अर्थववेद की 91 इस प्रकार 1131 शाखाएं हैं परन्तु 12 शाखाएं ही मूल ग्रन्थों में उपलब्ध हैं। वेद की प्रत्येक शाखा की वैदिक शब्द राशि चार भागों में उपलब्ध है।

ऋगवेद – ऋगवेद में अध्यात्मिक , मौलिक ज्ञान , विज्ञान, सृष्टि ज्ञान तथा प्रशासनिक आदि विषय वर्णित हैं।

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यजुर्वेद – यजुर्वेद में संसारिक,परम्पराओं सामाजिक नीतियों,अधिकारों तथा कर्तव्य़ों आदि का व्याख्यान है ।

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साम वेद – सामवेद में आराधना, कलात्मकता दार्शनिक्ता, संगीत एवं योग ज्ञान आदि वर्णित हैं।

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अथर्व-वेद – अथर्व-वेद में चिकित्सा तथा शरीर सम्बंधित ज्ञान वर्णित हैं। 

उप वेद:

प्रत्येक वेद के एक या एक से अधिक कई उप वेद हैं जिन में मूल अथवा अन्य विषयों पर अतिरिक्त ज्ञान है। उप वेदों के अतिरिक्त छः वेद-अंग भी हैं जो वेदों को समझने में सहायक हैं।
उपनिष्द:–  वेदों के संकलन के पश्चात भी कई ऋषियों ने अपनी अनुभूतियों से ज्ञान कोष में वृद्धि की है। उन्हों ने संकलित ज्ञान की व्याख्या, आलोचना तथा उस में संशोधन भी किया है। इस प्रकार के ज्ञान को उपनिष्दों तथा दर्शन शास्त्रों के रूप में संकलित किया गया है। उपनिष्दों की मूल संख्या लग भग 108 – 200 तक थी, किन्तु यह मानव समाज का दुर्भाग्य है कि अधिकतम उपनिष्दों को हिन्दू विरोधी तत्वों द्वारा नष्ट कर दिया गया। आज के समय में केवल 10 उपनिष्द ही उपलबद्ध हैं। इस प्रकार के ज्ञान को उपनिष्दों तथा दर्शन शास्त्रों के रूप में संकलित किया गया है। उपनिष्दों की मूल संख्या लग भग 108 – 200 तक थी, किन्तु यह मानव समाज का दुर्भाग्य है कि अधिकतम उपनिष्दों को हिन्दू विरोधी तत्वों द्वारा नष्ट कर दिया गया। आज के समय में केवल 10 उपनिष्द ही उपलबद्ध हैं।

उपांग (षट् दर्शन ):-

उपांग को छह भागों में विभाजित किया गया है जो निम्न प्रकार से है- पूर्वासृष्टि, वैशेशिका, न्याय, उत्तर मीमांसा, संख्या एवं योग|

पूर्वामीमांसा:-

इसमें जीवन के मौलिक सिद्धांतों की व्याख्या की गयी है इसके रचियता ऋषि जामिनी है। इसमें मुख्या रूप से धर्म – अधर्म का अंतर , गृहस्थ जीवन के कर्त्तव्य उनका निर्वहन , समाज के प्रति कर्त्तव्य व उनका पालन , योग का महत्व मानव जीवन पर आदि का व्याख्यान किया गया है।

न्याय दर्शन:-

इसके रचियता गौतम ऋषि है। इस दर्शन का मुखय उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना है जो सोलह तत्वों में विद्यमान है। इसका सविस्तार व्याख्या है।

वैशेशिका:-

इसमें धर्म को पूर्ण रूप से परिभाषित किया गया है। सांसारिक एवं आध्यात्मिक सफलता प्राप्त करना ही धर्म है। जीवन को सही तरह से व्यतीत करके उसके बाद आत्मा को पूर्ण पवित्र कैसे रखा जा सकता है और कैसे परम सुख को प्राप्त किया जा सकता है इसकी वेख्या इस भाग में की जा सकती है। इसके रचियता ऋषि कणाद है।

योग:-

ये दर्शन अपने में ध्यान , साधना एवं समाधि आदि को समाहित किये हुए है। ये परमात्मा , आत्मा , सांसारिक तत्वों , परमात्मा के स्वरुप , उपासना आदि के विषय में पूर्ण पारदर्शी ज्ञान प्रदान करता है। इसके रचियता पतंजलि है।

संख्या:-

इसके रचियता कपिल ऋषि है। इसका मुख्यविषय प्रकृति एवं उसका उत्पादन , परमात्मा एवं आत्मा पर आधारित है। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति एवं उसका विनाश उसमे प्रकति का विशिष्ट योगदान की व्याख्या की गयी है।

उत्तर मीमांसा:-

इसके रचियता ऋषि व्यास है। इसमें ईश्वर के सवरूप एवं मोक्ष की व्याख्या की गयी है इसमें बताया गया है की ईश्वर सर्वव्यापी , सर्वव्याप्त एवं परमानंद है। वह जनम – मरण के दुःख से स्वतन्त्र है। जीवात्मा इन दुखों से छुटकारा पाना चाहती है। इस दर्शन को ब्रह्मसूत्र के नाम से भी जाना जाता है।

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