आखिर क्यों काटा ब्रह्मा का पांचवा सिर भगवान शंकर ने ?

               <<<<जानिए ब्रम्हा के पांच मुख का रहस्य>>>

हिंदू पौराणिक कथाओं अनुसार, ब्रम्हा भगवान को शिवा शंकर ने उत्पन्न किया और सृष्टि की रचना करने का काम ब्रम्हा को दिया इसलिए ऐसा कहा जाता है कि ब्रह्मांड का निर्माण ब्रह्मा ने किया, जब ब्रम्हा मानसिक सृष्टि से विस्तार न कर सके तब उन्होंने एक स्त्री देवी का निर्माण किया जिसका नाम शत्रुपा था| शत्रुपा को सरस्वती, संध्या, या ब्राह्मी सहित विभिन्न नामों से जाना जाता था।

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हिंदू पौराणिक कथाओं मे ब्रह्मा के चार सिर समझाने के लिए उसकी कहानी का उपयोग होता है| जब ब्रह्मा जी ने शत्रुपा को बनाया, तब ब्रह्मा तुरंत शत्रुपा पर मुग्ध हो गए थे उन्होंने पहले इस तरह की सुंदरता कभी नहीं देखी थी। ब्रह्मा शत्रुपा  का हर जगह पीछा करने लगे,  शत्रुपा ब्रह्मा की टकटकी नजर से बचने के लिए विभिन्न दिशाओं में जाने लगी। वह जहाँ भी जाती जिस दिशा में भी जाती, ब्रह्मा उस पर नजर रखने के लिए अपना एक सिर विकसित कर लेते थे। इस प्रकार, ब्रह्मा के पांच सिर हो गए, हर तरफ एक सिर और पांचवां चार सरो के ऊपर विकसित कर लिया| ब्रह्मा के इस व्यवहार से मायूस, शत्रुपा बैचेन हो गई| तब भगवान महेश शिव, विध्वंसक, यह सब देख रहै थे और ब्रह्मा की कार्रवाई से बहुत नाराज थे| तब भगवान शिव प्रकट हुए और ब्रह्मा को सबक सिखाने के लिए  उनका  पांचवा  सिर काट दिया और निर्धारित किया कि शत्रुपा ब्रह्मा की बेटी है क्योंकि शत्रुपा का निर्माण उसके द्वारा हुआ और ब्रह्मा का शत्रुपा पर मुग्ध होना अत्यंत गलत है|

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  ब्रम्हा जी का सर काटने के बाद भगवान शिव ने निर्देश दिया और कहा,कि “अपवित्र” ब्रह्मा के लिए इस ब्रह्माण्ड में कोई उचित तपस्या का स्थान नहीं होग। इस प्रकार, त्रिमूर्ति, में अन्य दो देवताओं विष्णु और शिव कि पूजा जारी है और ब्रह्मा लगभग पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिए गए, इस घटना के बाद पश्चाताप से  पीङित ब्रह्मा ने  हर मुंह से एक  वेद  का पाठ भी किया ।

अन्य घटना का भी पौराणिक कथाओं मे प्रमाण मिलता है:-

 एक बार शिव पार्वती के साथ घूमते हुए एक दिन जब ब्रह्मा को देखने के लिए आए तो ब्रह्मा के चार सिर शिव की प्रशंसा कर रहे थे लेकिन पांचवें सिर बुराई की ध्वनि फैला रहे थे, पांचवें सिर से नाराज़ शिव ने, उसे काट दिया। खोपड़ी, तेजी से शिव के हाथो मे आगई और वह इसे जलने में सक्षम थे शिव प्रकृति की भलाई के लिए उस खोपड़ी को लिए पृथ्वी पर फिरते रहे , जब तक वह बनारस नही पहुचे। इस तरह से ब्रह्मा चार सिर के साथ ब्रह्मलोक मे वास करते है ।

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