क्यों है हिंदू धर्म में मूर्ति पूजा का विधान ?

जानिए हिंदू मान्यता में क्या है मूर्ति पूजा का रहस्य

हिंदू धर्म के सबसे कठिन और अस्पष्ट अवधारणाओं से एक है मूर्ति पूजा अक्सर इसे गलत समझा गया और गलत व्याख्या की गई।

आखिर क्यों हिंदु मूर्तियों की पूजा करतें है ? और वे वास्तव में इन मूर्तियों को कैसे देखते हैं ? आखिर मूर्ति क्या है ?

एक देवता की छवि जिसका उद्देश्य पूजा है उसी को ही हिन्दू धर्म में मूर्ति कहते हैं| हिंदू धर्म में मूर्तियों को प्रतिमा, विग्रह भी कहा जाता है|

1.) प्रतिमा- यह एक संस्कृत शब्द है जिसका मतलब है किसी देवता की छवि या समानता

2.) मूर्ति- यह एक संस्कृत शब्द है जिसका मतलब है किसी भी प्रतिबिम्ब को साकार रूप में अभिव्यक्ति|

3.) विग्रह- यह एक संस्कृत शब्द है जिसका तात्पर्य है आकार यह एक देवता की पवित्र छवि या चित्रण करने के लिए संदर्भित होता है, की हिंदू धर्म में मूर्तियों के स्थिर प्रतीकों का एक हिस्सा हैं ।

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मान्यताओं के अनुसार सनातन धर्म में 33 करोड़ देवी-देवताओं का जिक्र किया जाता है, जिनकी बड़े पैमाने पर मूर्तियां बनाई जाती हैं और भारत के अलग अलग जगह सभी राज्यों में प्रसिद्ध मंदिर भी है| ऊपर लिखे शब्दों से हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं : हिन्दू धर्म की प्रमुखता वाले भारत देश में इष्ट देवों की मूर्तियों बनाने और बिक्री का एक विस्तृत बाजार है।

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भारत में मूर्तियां बनाने का रिवाज तो है लेकिन अन्य संप्रदायों में यह माना जाता है कि हिन्दू धारा में रहने वाले लोग इन मूर्तियों की पूजा कर अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं, परंतु यह एक भ्रामक तथ्य है। दरअसल मूर्ति बनाना और उसके समक्ष रहकर ध्यान करना एक विज्ञान है। वैज्ञानिक आधार पर एक विशिष्ट मूर्ति का निर्माण कर उसमें ऊर्जा भरी जाती है।

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भिन्न-भिन्न प्रकार की मूर्तियां, भिन्न-भिन्न संरचनाओं से बनी होती हैं और आठ चक्रों का उनमें समावेश किया जाता है। मूर्ति कला एक ऐसा विज्ञान है, जिसके द्वारा उन मूर्तियों में सकारात्मक ऊर्जाओं को इस तरह पिरोया जाता है| कि जिस घर में वो रहती हैं उस घर के लोगों के जीवन को बेहतर करती हैं। यहां तक कि मंदिरों की संरचना भी पूरी तरह वैज्ञानिक आधार वाली होती है। यहां वर्तमान समय में बन रहे मंदिरों का जिक्र नहीं बल्कि प्राचीन समय में निर्मित मंदिरों का परिचय दिया जा रहा है। आप यकीन नहीं करेंगे लेकिन प्राचीन समय मंदिर बनाने का उद्देश्य केवल मूर्तियों की पूजा तक ही सीमित नहीं था।इसके अलावा परिक्रमा करने का स्थान, गर्भ गृह आदि सब बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यहां तक कि मूर्ति को बनाने के दौरान पढ़े जाने वाले मंत्र भी उसमें ऊर्जा भरने के लिए उपयोगी माने जाते हैं।

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प्राचीन समय में कभी भी यह नहीं कहा जाता था कि हमें मंदिर जाकर मूर्ति की पूजा करनी चाहिए और दान करना चाहिए। यह तो भौतिकवाद से ग्रस्त आज के दौर का सिस्टम बन गया है।पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार हमें मंदिर में जाकर कुछ देर बैठना चाहिए और ध्यान करने की कोशिश करनी चाहिए। इससे मंदिर की सीमा में मौजूद सकारात्मक शक्तियां हमारे शरीर और मस्तिष्क में प्रवेश करती है।किसी नए काम को शुरू करने से पहले या किसी स्थान पर जाने से पहले यह कहा जाता है कि मंदिर के दर्शन अवश्य करने चाहिए। इसके पीछे मान्यता यह है कि मंदिर के वातावरण में मौजूद सकारात्मक ऊर्जा आपके मस्तिष्क को स्वच्छ और सजीव कर, आपको सही दिशा में सोचने के लिए विवश करे। वास्तविक रूप में मंदिरों का निर्माण किसी देवस्थल के रूप में पूजा या दान-पुण्य के लिए नहीं किया गया था। यह तो ऊर्जा को एकत्रित करने के उद्देश्य से बनाए जाते थे। लेकिन आजकल उसके मौलिक महत्व को दरकिनार कर मंदिरों की महत्ता को न्यूनतम कर दिया गया है।

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